ग़ज़ल गुरु (غزل گورو)
इस ब्लॉग में सभी साहित्य-साधकों एवं शोधार्थियों का स्वागत है!
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
समझौता / Samajhauta
मुझको क्या चाहिए था मुझे क्या हुआ हासिल
जब भी खुद को समझाया मैं समझौता ही बन गया!
मेहरबानी / Meharbani
जी रहे थे हम अपनी हिस्सों में ज़िन्दगी
आप हिस्सा बने इसका मेहरबानी आपकी!!
कुछ खता / Kuchh Khata
कुछ खता हमसे हुई और कुछ निगाह-ए-यार से
देखते हैं आज हमको वो बेगानावार-से!
एक बार / Ek Baar
कर दे भले ही दूर वो पतंग कि तरह
एक बार आ के डोर जो वो थाम ले बहुत!
शिक्षा दी है / Shiksha Dee Hai
साधक को सदा ज्ञान की दीक्षा दी है!
याचक को सदा प्रेम की भिक्षा दी है!!
माँ, बहन, पत्नी, प्रिया, बेटी बन कर,
नारी ने हर एक रूप में शिक्षा दी है!!
गाँव की माटी / Ganv Ki Mati
मुझको कह रही है मेरे गाँव की माटी
घर न आ पर जहाँ रहे खुशहाल ही रहना
कुछ लोग / Kuchh Log
कुछ लोग डूब जाते हैं साहिल तलाशते
कुछ लोग डूबने को ही साहिल पे आते हैं!
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)