ग़ज़ल गुरु (غزل گورو)
इस ब्लॉग में सभी साहित्य-साधकों एवं शोधार्थियों का स्वागत है!
शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011
मैं भला / Main Bhala
मैं भला क्या सुनता था तेरी बातों के सिवा!
मुझे अब याद क्या रहा तेरी यादों के सिवा?
.......................(प्रवेश गौरी 'नमन')
बेहिसी में ही / Behisee me hi
रूह तो मर जाती है जीते जी आजकल
कटती है सारी ज़िन्दगी बस बेहिसी में ही!
दोस्त मिलेंगे / Dost Milenge
दोस्तों कि चाह में दुश्मन मिले बहुत
अब दुश्मनों कि चाह करो दोस्त मिलेंगे!
समझौता / Samajhauta
मुझको क्या चाहिए था मुझे क्या हुआ हासिल
जब भी खुद को समझाया मैं समझौता ही बन गया!
मेहरबानी / Meharbani
जी रहे थे हम अपनी हिस्सों में ज़िन्दगी
आप हिस्सा बने इसका मेहरबानी आपकी!!
कुछ खता / Kuchh Khata
कुछ खता हमसे हुई और कुछ निगाह-ए-यार से
देखते हैं आज हमको वो बेगानावार-से!
एक बार / Ek Baar
कर दे भले ही दूर वो पतंग कि तरह
एक बार आ के डोर जो वो थाम ले बहुत!
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