या तो मैं पागल हूँ या हर शख्स यहाँ भरमाया है!
दुनिया कहती-प्यार हुआ है, मैं कहता-सब माया है!!
सुबह की जो लालिमा है, बस सूरज के नाम न कर,
जुगनू बन कर मैंने ख़ुद को सारी रात जलाया है!
जीवन को रस्ते की तरह जी, बढ़ता चल, बढ़ता चल,
जितना कुछ पीछे खोया है, उतना आगे पाया है!
यूँ ही नहीं कोई आया है साकी तेरी चौखट पे,
होशमंद दुनिया में जाकर सबने धोखा खाया है!
एक परिंदा मेरे दिल का भरता था परवाज़ कई,
देख हवा में फैले विष को अपना पर कटवाया है!
तुझको सदा दिखाई देगी मक्कारी उन आँखों में,
जज़बातों का सौदा करके जिसने महल बनाया है!
आज़ फैसला होगा मेरे हुनर-ए-संग-तराशी का,
'नमन' मेरी महफ़िल के भीतर वो पत्थर-दिल आया है!!
.........................-प्रवेश गौरी 'नमन'
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011
तब भी प्रीत निभाओगी न / Tab Bhi Preet Nibhaogi Na
जब तुम भी होगी बुढ़िया,
मुझको भी बूढ़ा पोगी न!
ऐ मेरी प्राणों से प्यारी,
तब भी प्रीत निभाओगी न!!
वक़्त बड़ा वो बेरहम होगा,
आँखों से दिखना कम होगा,
नयनों की ज्योति कम होगी,
तब भी नयन मिलाओगी न!
हर रूप में शरीर ख़म होगा,
अंग-अंग में कम्पन होगा,
तब भी अपने हिलते हाथ से,
हाथ मेरा थाम पाओगी न!
ढीले होंगे अंग दमकते,
गिरने लगेंगे दांत चमकते,
मुंह में तेरे दांत न होंगे,
तब भी हँस के दिखोगी न!
जीवन के उस कटु सफ़र पे,
सफ़ेद आ जायेंगे सर पे,
तब भी प्यार से मेरे मुंह पर,
अपने केश लहराओगी न!
छिन जाएगी लाली अधर से,
झुकने लगेंगे दोनों कमर से,
तब ले अधरों पर माधुर्य,
मुझको गले लगाओगी न!
इतना बूढ़ा हो जाऊँगा,
कि मैं चल भी न पाऊंगा,
अपने तन से बौझित पावों पर,
मुझ तक चल कर आओगी न!
ढलती उम्र का होगा वो कहर,
पड़ा हूँगा मैं जब शय्या पर,
बूढी गोद में रख मेरा सर,
तब भी यूंही सहलाओगी न!
वक्त आखरी जब आएगा,
और मुझको लेकर जायेगा,
अंत घड़ी के उस अवसर पर,
बाहों में भर जाओगी न!
ऐ मेरी प्राणों से प्यारी,
तब भी प्रीत निभाओगी न!!
मुझको भी बूढ़ा पोगी न!
ऐ मेरी प्राणों से प्यारी,
तब भी प्रीत निभाओगी न!!
वक़्त बड़ा वो बेरहम होगा,
आँखों से दिखना कम होगा,
नयनों की ज्योति कम होगी,
तब भी नयन मिलाओगी न!
हर रूप में शरीर ख़म होगा,
अंग-अंग में कम्पन होगा,
तब भी अपने हिलते हाथ से,
हाथ मेरा थाम पाओगी न!
ढीले होंगे अंग दमकते,
गिरने लगेंगे दांत चमकते,
मुंह में तेरे दांत न होंगे,
तब भी हँस के दिखोगी न!
जीवन के उस कटु सफ़र पे,
सफ़ेद आ जायेंगे सर पे,
तब भी प्यार से मेरे मुंह पर,
अपने केश लहराओगी न!
छिन जाएगी लाली अधर से,
झुकने लगेंगे दोनों कमर से,
तब ले अधरों पर माधुर्य,
मुझको गले लगाओगी न!
इतना बूढ़ा हो जाऊँगा,
कि मैं चल भी न पाऊंगा,
अपने तन से बौझित पावों पर,
मुझ तक चल कर आओगी न!
ढलती उम्र का होगा वो कहर,
पड़ा हूँगा मैं जब शय्या पर,
बूढी गोद में रख मेरा सर,
तब भी यूंही सहलाओगी न!
वक्त आखरी जब आएगा,
और मुझको लेकर जायेगा,
अंत घड़ी के उस अवसर पर,
बाहों में भर जाओगी न!
ऐ मेरी प्राणों से प्यारी,
तब भी प्रीत निभाओगी न!!
सोमवार, 14 नवंबर 2011
मैं कितना लाचार बनाया / Main Kitna Lachar Banaya
(बाल-दिवस पर विशेष)
मैं कितना लाचार बनाया!
अच्छा था बीमार बनाया!!
छीन लिया मेरा भोलापन,
और मुझको हुशियार बनाया!
मै काग़ज था, नाव बना था,
पर तुमने अख़बार बनाया!
मैने ढाल बनाया था दिल,
तुमने दिल तलवार बनाया!
मेरे मन में सुखद स्नेह था,
पीड़ा-दायक प्यार बनाया!
और 'नमन' क्या बोलूं ज्यादा ,
फूल बना था, ख़ार बनाया!!
मैं कितना लाचार बनाया!
अच्छा था बीमार बनाया!!
छीन लिया मेरा भोलापन,
और मुझको हुशियार बनाया!
मै काग़ज था, नाव बना था,
पर तुमने अख़बार बनाया!
मैने ढाल बनाया था दिल,
तुमने दिल तलवार बनाया!
मेरे मन में सुखद स्नेह था,
पीड़ा-दायक प्यार बनाया!
और 'नमन' क्या बोलूं ज्यादा ,
फूल बना था, ख़ार बनाया!!
शुक्रवार, 11 नवंबर 2011
यही चाह / Yahi Chah
समस्त बाधाओं को समाप्त करने
हर पीड़ा का निवारण करने
मेरे रुकते जीवन को गति देने
हर सीमा को लाँघ कर
तुम उतर आओगी
मेरे जीवन में,
मेरे मन-उपवन में!
मन कुछ उदास भी है
एक हलकी -सी प्यास भी है
और....और...
तुमसे एक आस भी है.....
कि....कि....तुम
करोगी ये अनुकम्पा
ये अहसान
ये मेहरबानी
कि बन कर
एक मदमस्त नदिया
आन गिरोगी
मेरे हृदय के लघु-सागर में!
सर्वत्र होगा-
प्रेम, चाह
तुम्हारा मन-मोहक स्वरुप
और
उसी दृश्य के एक भाग में
हूँगा मैं......
एक पागल की भांति
खोया-खोया!
पुलकित मन
हर्षित आत्मा
रोमांचित रोम-रोम
रेशा- रेशा!
हाँ! ठीक ऐसा!
ठीक ऐसा ही होगा
जब मिलोगी तुम
मुझसे आकर-
कुछ हया
कुछ वफ़ा
कुछ आह
एक नई राह!
यही चाह,
बस! यही चाह!!
हर पीड़ा का निवारण करने
मेरे रुकते जीवन को गति देने
हर सीमा को लाँघ कर
तुम उतर आओगी
मेरे जीवन में,
मेरे मन-उपवन में!
मन कुछ उदास भी है
एक हलकी -सी प्यास भी है
और....और...
तुमसे एक आस भी है.....
कि....कि....तुम
करोगी ये अनुकम्पा
ये अहसान
ये मेहरबानी
कि बन कर
एक मदमस्त नदिया
आन गिरोगी
मेरे हृदय के लघु-सागर में!
सर्वत्र होगा-
प्रेम, चाह
तुम्हारा मन-मोहक स्वरुप
और
उसी दृश्य के एक भाग में
हूँगा मैं......
एक पागल की भांति
खोया-खोया!
पुलकित मन
हर्षित आत्मा
रोमांचित रोम-रोम
रेशा- रेशा!
हाँ! ठीक ऐसा!
ठीक ऐसा ही होगा
जब मिलोगी तुम
मुझसे आकर-
कुछ हया
कुछ वफ़ा
कुछ आह
एक नई राह!
यही चाह,
बस! यही चाह!!
मंगलवार, 8 नवंबर 2011
एक झलक / Ek Jhalak
*_*
*_*
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
वक्ष गिरी मुख चन्द्र, केश बन गए थे बदरी,
मुस्कान मंद स्वच्छंद छवि, आँखें कजरी!
कुछ डरी-डरी,ज्यों यौवन-गगरी,
जाए न छलक, जाए न छलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
आई नज़र पल-भर को जो वो कमर-कुमारी,
धड़कन धड़की धड़क, खिली ह्रदय-फुलवारी!
भर ठंडी आह, आह बोली,
कहाँ लोप रही वो आज़ तलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
अंग-अंग अंगड़ाई के बिन ही अंगड़ाता,
अंग-अंग स्वच्छंद भला किसको नहीं भाता!
अंग-अंग इंगित करता,
हर-एक के सीने में दलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
मंद पवन में मंद-मंद चुनरी लहरा कर,
चली गई पल में, ह्रदय में टीस उठा कर!
उससे मिलने की ह्रदय को,
अब हर पल रहे लगी ललक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
(कविता संग्रह "प्रथम-प्रेम पाती" से)
प्रिया की एक झलक!!
वक्ष गिरी मुख चन्द्र, केश बन गए थे बदरी,
मुस्कान मंद स्वच्छंद छवि, आँखें कजरी!
कुछ डरी-डरी,ज्यों यौवन-गगरी,
जाए न छलक, जाए न छलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
आई नज़र पल-भर को जो वो कमर-कुमारी,
धड़कन धड़की धड़क, खिली ह्रदय-फुलवारी!
भर ठंडी आह, आह बोली,
कहाँ लोप रही वो आज़ तलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
अंग-अंग अंगड़ाई के बिन ही अंगड़ाता,
अंग-अंग स्वच्छंद भला किसको नहीं भाता!
अंग-अंग इंगित करता,
हर-एक के सीने में दलक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
मंद पवन में मंद-मंद चुनरी लहरा कर,
चली गई पल में, ह्रदय में टीस उठा कर!
उससे मिलने की ह्रदय को,
अब हर पल रहे लगी ललक!
देखता रहा अपलक!
प्रिया की एक झलक!!
(कविता संग्रह "प्रथम-प्रेम पाती" से)
गुरुवार, 3 नवंबर 2011
बुधवार, 2 नवंबर 2011
बाद में / Bad Me
जिस दिन से मैंने किये साल अठारह पार
घर वाले और बाहर वाले पीछे पड़ गए यार
घर वाले और बाहर वाले पीछे पड़ गए यार
जेब में गोत्र लिए फिरते हैं
शादी के चर्चे करते हैं
मैं कहता हूँ- मुझे नौकरी पार लग जाने दो पहले
लेकिन बातों में तो वो सब मारते हैं नहले पर दहले
कहते हैं- अच्छा रिश्ता है, दहेज़ में खूब मिलेगा माल
नौकरी की भी मांग नहीं है कर लेना चाहे अगले साल
अब मैं इन सब बातों से बचता रहता हूँ
कोई ज़िक्र करे तो उसको ये कहता हूँ-
बिना नौकरी कर लूं शादी
ऐसा मैं भी नहीं अनाड़ी!
पहले पांव पे खड़ा तो हो लूँ
बाद में मारूंगा कुल्हाड़ी!!
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